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Saturday, 22 March 2025

एक अधूरी मोहब्बत | एक दर्दभरी प्रेम कहानी

"एक अधूरी मोहब्बत"
शहर के व्यस्त चौक पर अभी-अभी आदित्य नाम का एक लड़का रिक्शे से उतरा था। यह चौक लोगों से भरा हुआ था, सड़क के किनारे लगी दुकानें रोशनी में चमक रही थीं। आदित्य यहीं बने एक छोटे से फूड स्टॉल में काम करता था। उसी स्टॉल पर स्नेहा नाम की लड़की भी काम करती थी।

आदित्य स्टॉल के अंदर जाकर स्नेहा से कहता है, "तुम्हारी शिफ्ट पूरी हो गई है, अब तुम घर जा सकती हो।"
स्नेहा अंदर चली जाती है, लेकिन तभी आदित्य की नज़र सामने वाली इमारत पर पड़ती है। उस इमारत में उसकी पड़ोसन नेहा अकेली रहती थी। वह खिड़की के पास खड़ी थी, लेकिन उसने आदित्य की तरफ देखा तक नहीं।
स्नेहा आदित्य को उसकी तरफ देखते हुए देख लेती है और कहती है, "तुम्हें उससे दूर रहना चाहिए। मैंने सुना है कि नेहा अच्छी लड़की नहीं है। वो पैसे लेकर लड़कों की इच्छाएँ पूरी करती है। तुम्हें अपने काम पर ध्यान देना चाहिए।"
आदित्य उसकी बात अनसुनी कर देता है। उसके हाथ में मोबाइल होता है, और वह चुपचाप नेहा की तस्वीरें खींचने लगता है। कुछ ही देर में नेहा अंदर चली जाती है।
थोड़ी देर बाद, आदित्य पैसे गिन रहा था। इस स्टॉल का मालिक कोई और था, लेकिन उसे और स्नेहा को सैलरी के अलावा टिप के पैसे भी मिलते थे। अचानक, नेहा स्टॉल के पास आकर कहती है, "मुझे मीट मसाला चाहिए।"
आदित्य जल्दी-जल्दी मीट मसाला बनाने लगता है, लेकिन गलती से मीट नीचे गिर जाता है। वह माफी माँगता है, लेकिन नेहा कुछ नहीं कहती और बस उसकी तरफ देखकर मुस्कुराती है।
"काश, वो मुझे भी उसी तरह देखती जैसे मैं उसे देखता हूँ," आदित्य के मन में ख्याल आता है।
रात को जब स्टॉल बंद होने वाला था, तभी आदित्य का फोन बजता है। उसके पिता फोन पर कहते हैं, "बेटा, कुछ पैसों की ज़रूरत है।"
लेकिन आदित्य के पास पैसे नहीं थे। वह अपनी सेविंग के पैसे देखता है और सोचने लगता है कि जल्दी से पैसे कमाने का कोई और तरीका होना चाहिए।
तभी, एक लड़की उसके पास आती है और कहती है, "क्या तुम जल्दी पैसे कमाना चाहते हो?"
आदित्य चौंक जाता है। वह कहता है, "हाँ, लेकिन कैसे?"
लड़की उसे एक गली में ले जाती है, और फिर वहाँ उसके साथ वह सब करती है, जिसकी उसे उम्मीद नहीं थी। उसके बाद, वह उसे थोड़े से पैसे पकड़ाकर चली जाती है।
अगली सुबह, आदित्य की शिफ्ट खत्म हो चुकी थी और स्नेहा की शिफ्ट शुरू हो गई थी। लेकिन आदित्य की नज़र नीचे गिरे हुए एक बैग पर पड़ी।
उसने बैग उठाकर देखा तो उसमें नशे का सामान था। उसे लगा कि यह बैग विक्रम का होगा—विक्रम वही आदमी था, जो अक्सर नेहा के पास आता-जाता था।
आदित्य ने बैग अपने पास रख लिया और फिर उसमें से एक लिफाफा निकालकर मीट मसाले में डाल लिया। इसके बाद, वह सीधे नेहा के घर की तरफ बढ़ा।
"तुम्हारा दोस्त अपना बैग यहाँ भूल गया था," आदित्य ने कहा और उसे बैग पकड़ा दिया।
नेहा ने उससे पैसों के बारे में पूछा, लेकिन आदित्य ने पैसे लेने से मना कर दिया।
"मैं मीट मसाला फिर से खाना चाहती हूँ, लेकिन इस बार तुम्हें पैसे लेने होंगे," नेहा ने कहा और आदित्य को पैसे पकड़ाकर चली गई।
रात होते ही आदित्य ने स्टॉल खोली, लेकिन उसका मन काम में नहीं लग रहा था। स्नेहा ने उससे पूछा, "क्या हुआ? आज इतने उदास क्यों हो?"
आदित्य ने कहा, "मुझे नेहा की चिंता हो रही है। पता नहीं, वो कैसी लड़की है जो अपने पैसे कमाने के लिए यह सब करती है।"
स्नेहा को गुस्सा आ गया। "तुम उसके लिए इतना परेशान क्यों हो? वह सब कुछ अपनी मर्जी से कर रही है! मैं तुमसे प्यार करती हूँ, लेकिन तुमने कभी मेरी तरफ वैसे नहीं देखा!"
गुस्से में आकर स्नेहा ने आदित्य को चूमा। देखते ही देखते, दोनों इतने करीब आ गए कि आदित्य ने अपने होश खो दिए।
रात को आदित्य बाहर बैठा था और नेहा के घर को देख रहा था। आज उसके पास एक अमीर आदमी आया था।
आदित्य मन ही मन सोचने लगा, "काश, मेरे पास भी इतने पैसे होते। मैं भी उसे खरीद सकता।"
तभी, एक ग्राहक स्टॉल पर आया और उसने ऑर्डर दिया। वह फोन पर किसी से बात कर रहा था, और आदित्य ने सुना कि वह नेहा का मज़ाक उड़ा रहा था।
गुस्से में, आदित्य ने उसके ऑर्डर में कचरा मिला दिया।
कुछ देर बाद, जब वह आदमी नेहा के घर गया और खाना खाया, तो थोड़ी देर बाद दोनों—वह आदमी और नेहा—बाहर निकलकर उल्टी करने लगे।
"शायद उसे सिर्फ ग्राहक नहीं, बल्कि सजा भी मिलनी चाहिए," आदित्य सोचने लगा।
अगली सुबह, नेहा फिर से स्टॉल पर आई और आदित्य से मीट मसाला माँगा।
आदित्य ने कहा, "मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ। मैं तुम्हें खुश रखूँगा।"
नेहा हँस पड़ी, "तुम्हें लगता है कि तुम्हारे पास उतने पैसे हैं कि तुम मुझे खरीद सको?"
आदित्य ने उसे बताया कि उसने जानबूझकर ऑर्डर में कचरा मिलाया था।
नेहा गुस्से में बोली, "तुम्हारी वजह से मेरा एक ग्राहक चला गया! मुझे पैसों की ज़रूरत है!"
आदित्य को बहुत बुरा लगा। उसने अपनी सारी सेविंग निकाली और नेहा पर फेंक दी।
"तुम्हें तो सिर्फ पैसों से प्यार है!"
नेहा ने चुपचाप पैसे उठाए और फिर आदित्य का "पानी निकालने" लगी।
तभी, विक्रम वहाँ आ गया और आदित्य को बुरी तरह पीटने लगा।
"मेरा बैग कहाँ है?" विक्रम चिल्लाया।
आदित्य ने डरते-डरते कहा, "मैंने उसे कचरे में फेंक दिया।"
विक्रम गुस्से में और मारने वाला था कि तभी पुलिस की आवाज़ सुनकर भाग गया।
आदित्य जैसे ही बाहर निकला, उसने देखा कि स्नेहा जख्मी हालत में पड़ी थी। विक्रम ने उसे भी पीटा था, क्योंकि उसे लगा था कि बैग उसके पास है।
कुछ दिनों बाद, नेहा एक अमीर आदमी के साथ शहर छोड़कर चली गई।
स्नेहा अस्पताल से ठीक होकर आई और आदित्य से कहा, "तुमने कभी मेरी कदर नहीं की। अब मैं अपने गाँव जा रही हूँ।"
आदित्य उसे रोक नहीं सका।
वह वहीं खड़ा रह गया—टूटा हुआ, अकेला, और पछतावे में डूबा हुआ।


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